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Do Lamhe Zindagi gi Ke| दौ लम्हे जिंदगी के

                   दौ लम्हे जिंदगी के 


दिन गुज़रा और शाम का वो पल आ गया जिसका मुझे इन्तजार रहता है। यही तो वो दौ पल हैं, जो जिन्दगी में अहम है। दिन भर की सारी थकान भुल जाता हूं। मानों जैसे इन दौ पलों में दिन के 24 घंटे हो, जैसे सदियो से इन दौ पलों को जीय रहा हूं, जैसे सूखी मिट्टी श्रवण की पहली बारिश के इन्तजार में हो। घर का सारा काम खत्म करके मैं एकदम तरोताजा हो कर, सिटी पार्क की और चल पड़ा। आसमान में हल्के से बादल अपने उपर सफेद रंग की चादर उड़े हुए, सूरज को ढकने की कोशिश कर रहे हो। मैं जल्दी से जल्दी पार्क की ओर जाने के लिए उत्साहित था। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान के साथ दिल ही दिल में सोच रहा था के आज की मुलाकात में मैं नंदनी से क्या क्या बातें करूंगा। 
माफ़ कीजियेगा मैं बताना भुल गया, मैं हर रोज़ शाम को पार्क नंदनी से मिलने जाता हूं, नंदनी और मैं एक दुसरे से एक साल पहले जाॅब-इंटरव्यू में मिलें थे। पहली नज़र में ही हमें, वो हिन्दी फिल्मों वाला प्यार हो गया, नौकरी तो नहीं मिली हम दोनों को पर एक दुसरे का दिल जरूर मिल गया था। 
पार्क में पहुंचा तो देखा हर उम्र के बच्चे खेल रहे थे, कुछ बुजुर्ग लोग टेहल रहे थे। पार्क में लगे एक गुलमोहर के पेड़ के नीचे रखीं कुर्सियों पर, साफ़ सी कुर्सी देख मैं बैठ गया और नंदनी का इंतजार करने लगा।
चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की कूकू सुन कर और ठंडी ठंडी हवा के झोंको से मैं कब अपनी बीती यादों में खो गया कुछ पता ही नहीं चला। समय था के तेजी से चल रहा था और नंदनी आने का नाम नहीं ले रही थी, लेकिन कहते हैं न के वो प्यार ही क्या जिसमे इन्तजार न हो। इन्तजार की घड़ी चले जा रही थीं, सूरज ढलने को आ गया लेकिन नंदनी आज आज क्यों नहीं रहीं थीं। सभी बच्चो और बुजुर्ग घर की ओर जाने लगें, देखते ही देखते पार्क एक दम ख़ाली हो गया। पार्क में अब मैं, मेरा इन्तजार, मेरी तनहाई ओर पंछियों की चहचहाहट ही थी बाकी सब चले गए।
मैं खुद में खोया हुआ था के,इसी समय किसी के पैरों की आहट मेरे कानों में पड़ी। पीछे की ओर देखा तो नंदनी आ रही थी, दौ क़दम मैं भी आगे की ओर बढ़ाए। नंदनी को आते देख दिल जोर जोर से धड़कने लगा, आंखों में खुशी सी आ गई, जोर से एक सांस ली और  छोटी सी मुस्कान के साथ मैंने "हल्लो नंदनी" बोला। लेकिन नंदनी सर झुकाए खड़ी थी, आपने हाथ से उसके चेहरे को उपर किया तो  देखा उस की नम आंखों में जैसे पूरा सागर ही उतर गया हो, होंठ रेगीस्तान की तरह सुखे पड़ गये हो, दुसरे हाथ से उसका हाथ पकड़ा तो लगा के ठंडी बर्फ के पकड़ लिया हो। पूछने पर पता चला कि आज नंदनी की सगाई थी। जे सुन ऐसा लगा समय जैसे एक दम ठहर गया, तेज़ हवा के झोंके के साथ सुखे पड़े पत्ते पैरों को छूकर निकल रहे थे, डुबते सूरज की लालिमा से आसमान लाल लावे की तरह जलने  लगा पंछियों की चहचहाहट एक दम बंद हो गई। "मुझे भूल जाना, अब के बाद हम दोनों कभी नहीं मिलेंगे" यह बात बोलकर नंदनी चलीं गईं।
बादलों की घरघराहट से ज़ोर से बिजली चमकी ओर उस दिन मेरे साथ सारी काएनात रोने लगी। बारिश की बूंदों को देख किसी डाल पर बैठा पपिहा जोर जोर से पिहू पिहू करने लगा,। आज पुरे 2 साल हो गए हैं, मैं वो शहर छोड़ बहुत दूर आ गया, लेकिन उस पपिहे की आवाज सुन वह दौ लम्हे जिंदगी के याद कर लता हूं।
                                                       -- बेपरवाह मुसाफ़िर --

Comments

  1. Very nice and meaningful thought

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  2. O my god heart touching mind-blowing story

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  3. Outstanding mind-blowing, but little pain full story

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  4. Awesome story, rona aa gea pard kar

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  5. Super thanks
    https://WWW.indohindi.in

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  6. सादर सहृदय_/\_प्रणाम भैया जी।
    जय जय श्री राधेकृष्णा।

    "समर्पण का एक संकल्प बदल सकती है आपके मन और जीवन की दशा और दिशा"
    क्यों कि जिसे भगवद् शरण मिल जाए
    उसका जीवन सर्वब्यापी परमात्मा के द्वारा आरछित-सुरछित हो जाता है
    अनहोनी से बचाव और होनी में मंगल छिपा होता है।
    तथा मायापति की माया से भी अभयता मिलती है
    क्यों कि माया का मूल स्वरूप हमारे मन में स्थित भावनाऐं है
    जिन्हें हम भवसागर कहते हैं
    भगवद कृपाओं से हमें इसमें तैरना आ जाता है
    जिसके कारण हमारा मन विपरीत विषम् परिस्थितियों में भी शान्ति,प्रेम, और आनन्दमयी रहना सीख लेता है।

    "हमारे व हमारे अपनों के जीवन के लिए अति कल्याणकारी और महत्वपूर्ण, सद्गुण प्रदायिनी,भवतार
    िणी,शान्ति, भक्ति(प्रेम) और मोछप्रदायिनी भावना(प्रार्थना)"
    (जिसे स्वयँ के साथ बच्चों से भी किसी शुद्ध स्थान अथवा शिवलिँग पर कम से कम एक बार तो एक लोटा जल चढ़ाते हुए अवश्य करेँ और करवाऐँ) -
    1 ."हे जगतपिता", "हे जगदीश्वर" ये जीवन आपको सौँपता हूँ
    इस जीवन नैया की पतवार अब आप ही सँभालिए।
    2 ."हे करूणासागर" मैँ जैसा भी हूँ खोटा-खरा अब आपके ही शरण मेँ हूँ नाथ,
    मेरे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा , अब सब आपकी जिम्मेदारी है।"
    शरणागति का अर्थ है - "अपने मन का अहँ-अहँकार ,अपनी समस्त कामनाऐँ भी परमात्मा के श्री चरणोँ मे अर्पण कर देना
    अर्थात
    अपने जीवन की बागडोर परमात्मा को सौँप देना
    अतः
    समर्पण की प्रार्थना निष्पछ भाव से ही करेँ
    प्रभु जी रिश्ते भी निभातेँ है यदि पूर्ण श्रद्धा और विश्वास हो तो गुरू का भी।
    इस पोस्ट को प्रर्दशन ना समझेँ
    ये मेरे अनुभवोँ और भागवद गीता का सार है
    जिसे भगवद प्रेरणा से ही जनसेवार्थ बाँट रहा हूँ।
    ☆समर्पण की प्रार्थना कम से कम एक बार एक लोटा या एक अंजलि जल अर्पण करते हुए अवश्य करें ।
    एसा करने से हमारा परमात्मा के प्रति समर्पण का सँकल्प हो जाता है
    जो कि निश्चय ही फलदायिनी सिद्ध होती है ।☆
    साथ ही
    ये पूर्ण विश्वास रखें कि अब आपकी जीवन नैइया प्रभु जी के हाथों में है
    वो जो भी करेंगे
    उससे बेहतर आपके जीवन के लिए कुछ और नही हो सकता ।
    _/\_
    ।।जय श्री हरि।।

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  7. https://prabhusharanagti.blogspot.com/?m=1
    सादर सहृदय_/\_प्रणाम मेरे प्यारे भाइयों, बहनों।
    जय जय श्री राधेकृष्णा।

    "समर्पण का एक संकल्प बदल सकती है आपके मन और जीवन की दशा और दिशा"
    क्यों कि जिसे भगवद् शरण मिल जाए
    उसका जीवन सर्वब्यापी परमात्मा के द्वारा आरछित-सुरछित हो जाता है
    अनहोनी से बचाव और होनी में मंगल छिपा होता है।
    तथा मायापति की माया से भी अभयता मिलती है
    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें जीवन में वह धन मिलने लगता है जो हमारे जीवन के साथ भी सार्थक होता है और जीवन के बाद भी ।

    क्यों कि माया का मूल स्वरूप हमारे मन में स्थित भावनाऐं है
    जिन्हें हम भवसागर कहते हैं
    भगवद कृपाओं से हमें इसमें तैरना आ जाता है
    जिसके कारण हमारा मन विपरीत विषम् परिस्थितियों में भी शान्ति,प्रेम, और आनन्दमयी रहना सीख लेता है।

    "हमारे व हमारे अपनों के जीवन के लिए अति कल्याणकारी और महत्वपूर्ण, सद्गुण प्रदायिनी, भवतारिणी,शान्ति, भक्ति(प्रेम) और मोछप्रदायिनी भावना(प्रार्थना)"
    (जिसे स्वयँ के साथ बच्चों से भी किसी शुद्ध स्थान अथवा शिवलिँग पर कम से कम एक बार तो एक लोटा या एक अंजलि जल चढ़ाते हुए अवश्य करेँ और करवाऐँ) -

    1 ."हे जगतपिता", "हे जगदीश्वर" ये जीवन आपको सौँपता हूँ
    इस जीवन नैया की पतवार अब आप ही सँभालिए।


    2 ."हे करूणासागर" मैँ जैसा भी हूँ खोटा-खरा अब आपके ही शरण मेँ हूँ नाथ,
    मेरे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा , अब सब आपकी जिम्मेदारी है।"

    3. "हे जगत पिता" "हे जगदीश्वर" ये संसार आपको भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते है कोई अल्लाह कहता है तो कोई ईश्वर, कोई ईशा पुकारता है तो कोई वाहेगुरु
    परंतु हे नाथ आप जो भी हैं जैसे भी हैं अब मैं अपने आप को आप की शरण में सौंपता हूं ।

    4. हे जगत प्रभु आपका सच्चा स्वरूप क्या है इस जीवन का उद्देश्य क्या है यह मैं नहीं जानता ।
    अब मैं जैसा भी हूं खोटा या खरा स्वयं को शिष्य रूप में आपको अर्पण करता हूं।
    आप समस्त जगत् के गुरू हैं अतः आपसे आप में आप मेरे भी गुरु हैं
    हे शरणागत भक्तवत्सल अपने शरणागत को शिष्य रूप में स्वीकार करने की कृपा करें।

    प्यारे दोस्तों शरणागति का अर्थ है - "अपने मन का समस्त अहँकार अर्थात अपने ज्ञान और बुद्धि की श्रेष्ठता का भाव ,अपनी समस्त कामनाऐँ भी परमात्मा के श्री चरणोँ मे अर्पण कर देना
    अर्थात
    अपने जीवन की बागडोर परमात्मा को सौँप देना
    अतः
    समर्पण की प्रार्थना करते समय यह भूल जाएं कि इस संसार में ईश्वर ही सत्य है अल्लाह ही सत्य हैं ईशा ही सत्य है
    क्योंकि
    यह वह कट्टरता का भाव है जिसके आधीन होकर हम एक ही ईश्वर को अनेक रूपों में बांटते और अनुसरण करते हैं

    ऐसा हमारे अहंकार भाव अर्थात जगत व्यापी माया के कारण जानिए
    जिसके वशीभूत हो हम एक ही ईश्वर को अनंत रूपों में बांटते और नए नए पंथ-मतों का निर्माण करते जा रहे हैं ,
    इसलिए
    कम से कम समर्पण की प्रार्थना करते समय निष्पछ भाव से ही करेँ ।

    आपके एक हृदयगत समर्पण पर मात्र से ही भगवत कृपा से धीरे धीरे आपके जीवन में सत्य असत्य का बोध हो जाएगा
    तथा
    जीवन शांति मुक्ति भक्ति प्रेम और आनंद से भरपूर हो जाएगा।

    प्रभु जी रिश्ते भी निभातेँ है यदि पूर्ण श्रद्धा और विश्वास हो तो गुरू का भी।

    कृपया इस प्रेरणा को प्रर्दशन अथवा धार्मिक प्रचार ना समझेँ
    ये मेरे अनुभवोँ और भागवद गीता का सार है
    जिसे भगवद प्रेरणा से ही जनसेवार्थ बाँट रहा हूँ।
    क्योंकि
    प्रभु जी ने एक घटना चक्र के माध्यम से मुझे निस्वार्थ सेवा भाव से जीवन जीने का संकल्प कराया था।

    ☆समर्पण की प्रार्थना कम से कम एक बार एक लोटा या एक अंजलि जल अर्पण करते हुए अवश्य करें ।
    एसा करने से हमारा परमात्मा के प्रति समर्पण का सँकल्प हो जाता है
    जो कि
    हमारे समर्पण में अनिवार्य विशुद्ध
    भावनाओं के अभाव को पूरा करता है।

    जो संकल्प के माध्यम से निश्चय ही फलदायिनी सिद्ध होती है ।☆

    साथ ही
    ये पूर्ण विश्वास रखें कि अब आपकी जीवन नैइया प्रभु जी के हाथों में है
    वो जो भी करेंगे और जैसा भी करवाएंगे
    उससे बेहतर आपके जीवन के लिए कुछ और नही हो सकता ।
    _/\_
    ।।जय श्री हरि।।

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  8. यह बहुत अच्छा है आपका ब्लॉग. I’m also a big fan of writing down goals and keeping up with them for that very same reason–to see my progress and get encouraged to keep going. If there’s no feeling of progress, then motivation can dwindle before you accomplish what you set out to. Great article!

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  9. बहुत अच्छा लेख, जानकारी साझा करने के लिए धन्यवाद

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  10. जानकारी के लिए धन्यवाद।

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  11. आमतौर पर मैं कभी ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं करता। आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं

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